गायत्री मंदिर परिसर में प्रयाग साहित्य समिति के कवियों ने कविताएं भी पढ़ी

संवाददाता तुकाराम कंसारी

छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, राजिम। शहर के गायत्री मंदिर परिसर में चौबेबांधा निवासी कवि एवं साहित्यकार संतोष कुमार सोनकर मंडल को सम्मानित किया गया। लगातार उनके लेखन कार्यों से प्रभावित होकर प्रयाग साहित्य समिति राजिम के द्वारा साहित्यिक उपलब्धियां के लिए उन्हें सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित दिल्लीवार कुर्मी समाज परिक्षेत्र के संरक्षक आसाराम वर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि कवि सोनकर लेखन के बदौलत राजिम क्षेत्र का नाम देशभर प्रतिस्थापित किया है। प्रतिष्ठित विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अक्सर उनकी रचनाएं पढ़ने को मिलती ही रहती है। यह कविता, कहानी और आलेख पर लगातार लिख रहे हैं निश्चित ही हमारे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है। रत्नांचल जिला साहित्य एवं जन कल्याण समिति गरियाबंद के अध्यक्ष जितेंद्र सुकुमार साहिर ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य को अक्सर पर्यायवाची रूप से लेखन कहा जाता है विशेष रूप से रचनात्मक लेखन और काव्यात्मक रूप से लेखन की कला कहा जाता है। कोई ऐसे ही साहित्यकार नहीं बन जाता है इसके लिए खूब मेहनत करनी होती है। श्री सोनकर विगत 25 सालों से धर्म अध्यात्म तथा सकारात्मक विषयों पर कलम चला रहे हैं। इन्हें सम्मानित करके हमारी प्रयाग सहित्य समिति अत्यंत गौरवान्वित महसूस कर रही है। प्रयाग साहित्य समिति के संरक्षक नूतन लाल साहू ने कहा कि साहित्य समय मांगता है साहित्यकार जब बूढ़ा होता है तब उनकी लेखनी जवान होती है। राजिम में लंबे समय से साहित्यिक गतिविधियां निरंतर चली आ रही है पंडित सुंदरलाल शर्मा से लेकर पुरुषोत्तम अनासक्त, संत कवि पवन दीवान, कृष्ण रंजन इत्यादि के अलावा अनेक रचनाकारों की लेखनी निरंतर इस बात की गवाही है कि राजिम साहित्य के क्षेत्र में अत्यंत समृद्ध है।

भाग जाना बुजदिलों का काम है: साहिर

प्रयाग साहित्य समिति के अध्यक्ष टीकमचंद सेन ने कविता पढ़ते हुए मां की महिमा का गुणगान किया। प्रस्तुत है कुछ अंश-हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार, कर न सको जो मां की रक्षा, जीवन है बेकार। हास्य व्यंग्य के कवि संतोष सेन के व्यंग्य की बानगी देखिए-शराब स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है या हानिकारक मैं नहीं जानता, पर इतना जरुर जानता हूं कि इससे प्रशासन की सेहत अच्छी रहती है। जितेंद्र सुकुमार साहिर ने गजल भी प्रस्तुत किया, पेश हैं चंद पंक्तियां,-मुश्किलें हालात से डर जाऊं क्या, औरों सा मैं जीते जी मर जाऊं क्या, भाग जाना बुजदिलों का काम है, पूछा दिल ने ऐसा मैं कर जाऊं क्या, मन मेरा लगता नहीं परेशां मैं, लौट कर अपने में भी घर जाऊं क्या।

साहित्य करती है संस्कृति का संचार: सोनकर

साहित्यकार संतोष कुमार सोनकर मंडल ने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य वह कृति है जो संस्कृति का संचार करती है। व्यापक अर्थों में साहित्य मानव अनुभव, विचारों, भावनाओं को व्यक्त करने वाली लिखित या मौखिक रचनाओं को संदर्भित करता है यह किसी विशेष संस्कृति या समाज के ज्ञान और मूल्यों को भी दर्शाता है। साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में हमेशा अच्छाई लाने का प्रयत्न करता है इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। इस तरह से साहित्यिक उपलब्धियां के लिए कोई साहित्यकार सम्मानित होते हैं तो समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियां और बढ़ जाती है। हर संभव अच्छे साहित्य देने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। उन्होंने सम्मानित करने पर आभार प्रकट भी किया। वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सेन ने कहा कि छत्तीसगढ़ी साहित्य का क्षेत्र विराट है। ज्यादा से ज्यादा छत्तीसगढ़ी में रचनाएं लिखें और उन्हें आगे बढ़ाने में लगे रहे। इस कार्यक्रम में श्री सोनकर को जन्मदिन की बधाई भी दी गई।

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