@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, रायपुर।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक घटना चर्चा में है, जिसने न सिर्फ़ स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली, बल्कि सत्ता और कानून के रिश्ते पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

9 अगस्त 2025 की रात, बलौदाबाजार जिले के ग्राम ढाबाडीह स्थित नंदलाल फ्यूल पेट्रोल पंप पर जो हुआ, वह केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिबिंब है जिसमें सत्ता से जुड़ाव, अपराध करने का लाइसेंस समझा जाता है।

घटनाक्रम

पीड़ित विनोद दुबे, जो पेट्रोल पंप में सुपरवाइज़र हैं, रात करीब 11 बजे अपने काम में व्यस्त थे। तभी आरोपी आशीष बघेल (ग्राम सेम्हराडीह), अपने दो साथियों कृष्णा वर्मा उर्फ राजा वर्मा (ग्राम चांपा) और भीम साहू (ग्राम सेम्हराडीह) के साथ पहुंचा।
आशीष बघेल ने एक बहाना बनाकर विनोद को पास के ढाबे के सामने खड़े ट्रक तक बुलाया। वहां पहुंचते ही तीनों ने मिलकर गालियां देना शुरू किया, धमकी दी — “तुम अपने आप को बड़ा होशियार समझते हो” — और फिर बेल्ट, मुक्कों, लातों से बेरहमी से पीट दिया।

हमले के दौरान बार-बार एक ही बात दोहराई गई — “चाचा हमारे मंत्री हैं”।
यह ‘चाचा’ कोई मामूली व्यक्ति नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा हैं।
इस बयान से न केवल पीड़ित को डराने की कोशिश हुई, बल्कि एक साफ संदेश भी दिया गया कि सत्ता से रिश्ते अपराध को ढाल बन सकते हैं।

चोट और एफआईआर

मारपीट में पीड़ित के दोनों हाथ, पीठ और पैरों में गंभीर चोटें आईं है, हालांकि
थाना सिटी कोतवाली में अपराध क्र. 756/2025 दर्ज हुआ, धाराएं — 296, 351(2), 115(2), 118(2), 3(5) बीएनएस — के तहत मामला पंजीबद्ध हुआ।
पुलिस अधीक्षक भावना गुप्ता के निर्देशन में 12 अगस्त को तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। उन्होंने पूछताछ में अपराध स्वीकार भी कर लिया।

मुख्य सवाल — क्या कानून सच में सबके लिए समान है?

भारत का संविधान साफ कहता है — “कानून की नजर में सभी बराबर हैं”।
लेकिन आम धारणा यह है कि सत्ता के नजदीक खड़े लोगों के लिए कानून की रफ्तार धीमी और नरम हो जाती है।
यह मामला उस धारणा को और मजबूत करता है।
अगर आरोपी का मंत्री चाचा न होता, तो क्या पुलिस की कार्रवाई तीन दिन बाद होती?
क्या गिरफ्तारी इतनी औपचारिक और शांत होती?

मंत्री जी नैतिक जिम्मेदारी के बजाय जवाब देने से भागते दिखे

राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा को इस मामले में नैतिक रूप से दो कदम आगे आकर कहना चाहिए लेकिन पारिवारिक मोह जनता जनार्दन के ऊपर भारी पड़ा वे जवाब देने से भागते रहे।

“कानून सबके लिए समान है, चाहे वह मेरा भतीजा ही क्यों न हो।”

दिखावे का यह बयान सिर्फ़ व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ही नहीं बचाएगा, बल्कि जनता के बीच यह संदेश भी देगा कि सत्ता का इस्तेमाल अपराधियों की ढाल बनने के लिए नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा के लिए होता है। लेकिन यह चिंतनीय है की सत्ता पक्ष द्वारा अपराधियों को ऐसा शह मिलता है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बिगड़ती जा रही है और आपराधिक तत्वों पर भी सत्ता का अहंकार सर चढ़कर बोलने लगा है। ऐसे में जनता जनार्दन कानून के ऊपर कैसे विश्वास कर सकता है?

सवाल है ?क्या रसूखदार मंत्री के भतीजे पर कानून वही रूप अख्तियार करेगी जो अन्य अपराधियों से करती है ?या उन्हें बचाने का प्रयास करती है।

जन-हित में चेतावनी

अगर “चाचा मंत्री हैं” जैसी मानसिकता को समय रहते रोका नहीं गया, तो यह लोकतंत्र में जनता के भरोसे को खोखला कर देगी।
लोग मानने लगेंगे कि इस प्रदेश में शासन नहीं, बल्कि रिश्तेदारी का राज चलता है — जहां अपराधी की ताकत उसका हथियार नहीं, बल्कि उसके रिश्ते होते हैं।

निष्कर्ष

यह घटना केवल एक पुलिस केस नहीं, बल्कि एक टेस्ट केस है —
क्या छत्तीसगढ़ का प्रशासन यह साबित कर सकता है कि सच में कानून के सामने सब बराबर हैं?
या फिर यह भी एक ऐसा प्रकरण बन जाएगा जिसमें सत्ता का नाम आते ही न्याय का तराजू झुक जाता है?
समय का जवाब ही इस सवाल का फैसला करेगा।

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