@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, कुरूद। ग्राम नारी के युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि देशभक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि पसीने और संघर्ष से लिखी जाती है। सेना, अग्निवीर, पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों में भर्ती का सपना लेकर गांव के सैकड़ों युवा प्रतिदिन नए गौठान मैदान में पहुंचते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें अभ्यास से पहले अपना मैदान तैयार करना पड़ता है।
जिस मैदान में युवाओं को दौड़ना चाहिए, वहां वे फावड़ा और तसला लेकर गड्ढे भरते दिखाई देते हैं। जहां शारीरिक प्रशिक्षण होना चाहिए, वहां श्रमदान कर मैदान समतल किया जा रहा है। देश सेवा की तैयारी कर रहे इन युवाओं का सबसे बड़ा संघर्ष आज भर्ती परीक्षा नहीं, बल्कि अपने ही गांव में एक अभ्यास योग्य मैदान बचाना बन गया है।
युवाओं के अनुसार नया गौठान मैदान भारी ओवरलोड रेत वाहनों की आवाजाही से पूरी तरह उबड़-खाबड़ हो चुका है। मनाही के बावजूद लगातार वाहन गुजरने से जगह-जगह बड़े गड्ढे बन गए हैं। कई बार पंचायत और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को इसकी जानकारी देने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
हार मानने के बजाय युवाओं ने स्वयं आगे बढ़कर मैदान को संवारने का बीड़ा उठाया। अपने निजी पैसों से कई ट्रैक्टर रेत डलवाई, श्रमदान कर मैदान समतल किया और अभ्यास योग्य बनाने का प्रयास किया। मैदान की सुरक्षा के लिए अपने खर्च से पोल और तार-घेरा भी लगाया, लेकिन असामाजिक तत्व बार-बार पोल उखाड़ ले जाते हैं और तार-घेरा चोरी कर लेते हैं। इसके बावजूद युवा फिर अपने खर्च से पोल और तार लगाकर मैदान को बचाने की कोशिश में जुटे हैं।
युवाओं का कहना है कि अब उनकी मेहनत का बड़ा हिस्सा अभ्यास में नहीं, बल्कि मैदान को बार-बार ठीक करने में निकल जाता है। फिर भी उनके हौसले कम नहीं हुए हैं। रोज सुबह और शाम गांव के युवा देश सेवा का सपना लेकर मैदान में पसीना बहाते हैं और अपने दम पर तैयारी जारी रखे हुए हैं।
ग्राम नारी के इन युवाओं ने अपने सीमित संसाधनों से यह संदेश दिया है कि इरादे मजबूत हों तो अभाव भी हार मान लेते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जिन युवाओं को देश की सीमाओं की रक्षा के लिए तैयार होना चाहिए, उन्हें पहले अपने अभ्यास मैदान की रक्षा करनी पड़ रही है।
यह समाचार केवल ग्राम नारी की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण युवाओं की आवाज है जो संसाधनों के अभाव में भी भारत माता की सेवा का सपना संजोए हुए हैं। अब जरूरत है कि प्रशासन, पंचायत और जनप्रतिनिधि इस जज्बे को पहचानें, मैदान को सुरक्षित करें, उसे समतल और सुविधायुक्त बनाएं तथा इन युवाओं के प्रयासों को वह सहयोग दें जिसके वे वास्तव में हकदार हैं।
ग्राम नारी के इन युवाओं ने अपने सीमित संसाधनों से यह संदेश दिया है कि इरादे मजबूत हों तो अभाव भी हार मान लेते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जिन युवाओं को देश की सीमाओं की रक्षा के लिए तैयार होना चाहिए, उन्हें पहले अपने अभ्यास मैदान की रक्षा करनी पड़ रही है।
यह समाचार केवल ग्राम नारी की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण युवाओं की आवाज है जो संसाधनों के अभाव में भी भारत माता की सेवा का सपना संजोए हुए हैं। अब जरूरत है कि प्रशासन, पंचायत और जनप्रतिनिधि इस जज्बे को पहचानें, मैदान को सुरक्षित करें, उसे समतल और सुविधायुक्त बनाएं तथा इन युवाओं के प्रयासों को वह सहयोग दें जिसके वे वास्तव में हकदार हैं।
यदि ऐसे संघर्षशील युवाओं को एक बेहतर मैदान और बुनियादी सुविधाएं मिल जाएं, तो ग्राम नारी आने वाले वर्षों में देश को अनेक सैनिक, पुलिसकर्मी और सुरक्षा बलों के जवान दे सकता है।








