@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, रायपुर/ धमतरी/कुरूद। किसानों की आय बढ़ाने, जल संरक्षण और 1054.25 हेक्टेयर खरीफ क्षेत्र को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वीकृत कोड़ेबोड़ सूक्ष्म सिंचाई योजना अब गंभीर प्रशासनिक सवालों के घेरे में है। जल संसाधन विभाग द्वारा इस योजना के लिए 31 करोड़ 73 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे। योजना का निर्माण नाबार्ड (RIDF-XXV) के वित्तीय सहयोग से कराया गया तथा कार्य पूर्ण कराने की जिम्मेदारी मुख्य अभियंता, महानदी परियोजना, जल संसाधन विभाग, रायपुर को सौंपी गई थी।
परियोजना स्थल पर लगे बोर्ड के अनुसार कार्य पूर्ण होने की निर्धारित तिथि 27 दिसंबर 2024 थी। इसके बावजूद क्षेत्र के किसानों का आरोप है कि अधिकांश खेतों तक आज भी पाइपलाइन नहीं पहुंची है। जहां पाइप बिछाए गए हैं, वहां भी पानी नहीं चढ़ रहा है। किसानों का कहना है कि पाइपलाइन बिछाने में लेवल का समुचित परीक्षण नहीं किया गया, जिससे पूरी व्यवस्था कई स्थानों पर निष्प्रभावी हो गई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने विभागीय अधिकारियों से टिकाऊ पाइपलाइन लगाने की मांग की थी, लेकिन उनकी बातों को अनदेखा कर कम गुणवत्ता वाली प्लास्टिक पाइपें बिछाई गईं, जिनमें कई स्थानों पर टूट-फूट दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि निर्माण कार्य के दौरान बार-बार शिकायत करने के बावजूद अधिकारियों ने स्थानीय लोगों की बातों को गंभीरता से नहीं लिया।
अब उठ रहे हैं बड़े प्रशासनिक सवाल
यदि परियोजना वास्तव में पूर्ण हो चुकी है, तो—
- – क्या विभाग के पास पूर्णता प्रमाण पत्र (Completion Certificate) उपलब्ध है?
- – क्या कार्य का अंतिम माप पुस्तिका (Measurement Book – MB) के अनुसार सत्यापन किया गया?
- – क्या करोड़ों रुपये का भुगतान वास्तविक भौतिक प्रगति के अनुरूप किया गया?
- – क्या गुणवत्ता परीक्षण और तकनीकी निरीक्षण नियमानुसार हुआ?
- – क्या 1054.25 हेक्टेयर क्षेत्र में वास्तव में सिंचाई शुरू हो चुकी है?
- – यदि नहीं, तो परियोजना को पूर्ण मानने का आधार क्या है?
- इन सवालों के जवाब केवल विभागीय रिकॉर्ड ही दे सकते हैं।
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जवाबदेही किसकी..?
परियोजना की प्रशासकीय स्वीकृति राज्य शासन द्वारा दी गई थी और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर थी। ऐसे में यदि किसानों के आरोप सही पाए जाते हैं, तो केवल ठेकेदार ही नहीं बल्कि कार्य का निरीक्षण, मापन, गुणवत्ता परीक्षण, भुगतान स्वीकृति और पूर्णता प्रमाणित करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
उच्चस्तरीय जांच की मांग
क्षेत्र के किसानों ने मांग की है कि राज्य शासन इस परियोजना की स्वतंत्र तकनीकी, वित्तीय एवं गुणवत्ता जांच कराए। साथ ही माप पुस्तिका (MB), भुगतान विवरण, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, पूर्णता प्रमाण पत्र, उपयोगिता प्रमाण पत्र तथा वास्तविक सिंचाई क्षमता का सार्वजनिक सत्यापन कराया जाए। यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
सबसे बड़ा सवाल : इतनी क्या जल्दबाजी थी
कोड़ेबोड़ सूक्ष्म सिंचाई योजना के संबंध में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब क्षेत्र के अनेक किसानों के अनुसार परियोजना का लाभ अभी तक पूरी तरह जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा, तो आखिर ऐसी क्या प्रशासनिक जल्दबाजी थी कि प्रदेश के मुख्यमंत्री से इसका लोकार्पण करा दिया गया?
किसानों का कहना है कि कई खेतों तक पाइपलाइन नहीं पहुंची, जहां पहुंची वहां भी पानी नहीं चल रहा और तकनीकी खामियों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। यदि ये दावे सही हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकार्पण से पहले विभाग ने परियोजना की वास्तविक स्थिति का तकनीकी सत्यापन कराया था?
अब यह जांच का विषय है कि क्या विभाग ने परियोजना को पूर्ण एवं संचालन योग्य बताते हुए लोकार्पण का प्रस्ताव भेजा था, या फिर जमीनी स्थिति और विभागीय अभिलेखों में अंतर है। यदि ऐसा पाया जाता है, तो यह केवल निर्माण गुणवत्ता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ा गंभीर विषय बन जाएगा।
स्थानीय लोगों और किसानों का कहना है कि उनकी आपत्तियों और समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसलिए वे मांग कर रहे हैं कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक जांच कराई जाए। जांच से ही यह स्पष्ट होगा कि परियोजना अपने स्वीकृत उद्देश्यों के अनुरूप पूरी हुई है या नहीं, और कहीं किसी स्तर पर अनियमितता या प्रक्रियागत चूक तो नहीं हुई।








