@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, कुरुद / धमतरी, 14 अक्टूबर 2025। कुरुद विकासखंड के अंतर्गत नारी–गाड़ाडीह मार्ग पर चल रहे सड़क निर्माण कार्य में खुलेआम कार्यादेश के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं।
यह परियोजना, ग्रामीण इलाकों के सड़कों को सुविधायुक्त बनाकर जनता जनता की सुविधा के लिए स्वीकृत की गई थी, अब भ्रष्टाचार और विभागीय मिलीभगत का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है।

स्थानीय ग्रामीणों की बार-बार शिकायतों के बावजूद लोक निर्माण विभाग के अधिकारी और ठेकेदार मिलकर गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
निर्धारित प्राक्कलन और तकनीकी मानकों को नज़रअंदाज़ करते हुए, सड़क निर्माण में घटिया लाल गिट्टी, खराब मटेरियल, और बिना मुरूम बिछाए सीधे गिट्टी डालने जैसी अनियमितताएं की जा रही हैं।
कहीं-कहीं तो रोलर भी नहीं चलाया गया है, जिससे सड़क की बुनियाद कमजोर पड़ रही है और पूरे निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का कार्य न केवल तकनीकी उल्लंघन है बल्कि वित्तीय अनियमितता और सरकारी धन के दुरुपयोग की श्रेणी में भी आता है।
स्पष्ट है कि ठेकेदार और विभागीय अफसरों की मिलीभगत से जनता के करोड़ों रुपये का सीधा दोहन हो रहा है — और विभाग मौन रहकर इस भ्रष्टाचार का सह-भागी बन चुका है।

स्थल निरीक्षण में खुली पोल — जनता और मीडिया की मौजूदगी में हुआ खुलासा

जब स्थानीय ग्रामीण और पत्रकार निर्माण स्थल पर पहुंचे तो वहाँ का दृश्य किसी “भ्रष्टाचार के वर्कशॉप” से कम नहीं था।
गिट्टी में धूल, मुरूम का नामोनिशान नहीं, और काम में कोई तकनीकी पर्यवेक्षण नहीं दिखा।

जब इस अनियमितता पर ठेकेदार प्रतीक सुराना से सवाल किया जाता है तो वह कहते हैं —

“एसडीओ साहब के निर्देश में काम हो रहा है। लाल गिट्टी का मतलब घटिया गुणवत्ता वाला नहीं होता, ग्रामीणों द्वारा काम में अनियमितता की शिकायत पर सुधार दिया गया है।”

वहीं दूसरी ओर, जब एसडीओ शुक्ला से बात किया जाता है वे कहते हैं —

“मैंने ठेकेदार को घटिया काम न करने का निर्देश दिया है। जितनी शिकायतें मिली है काम को सुधरवाया गया है। मेरे जैसा सबको मैनेज करने वाला अधिकारी नहीं मिलेगा।”

अब बड़ा सवाल यह है —
अगर ठेकेदार अफसर का नाम ले रहा है, और अफसर ठेकेदार को दोषी बता रहा है, तो वास्तव में गड़बड़ी कौन कर रहा है?
या फिर दोनों ‘मलाई बांटने के साझेदार’ हैं और जनता की गाढ़ी कमाई इस साझेदारी में बहाई जा रही है?

⚠️ धांधली की नई परिभाषा — जवाबदेही शून्य, बेपरवाही चरम पर

ठेकेदार कहता है — “अफसर के कहने पर काम कर रहा हूं।”
अफसर कहते हैं — “ठेकेदार को निर्देश कर काम सुधारा गया है।”
विभागीय इंजीनियर और एसडीओ दोनों का रवैया यह साबित करता है कि यहां जवाबदेही खत्म हो चुकी है।

जनता देख रही है कि काम घटिया है, शिकायतें हो रही हैं, लेकिन अफसरों के दफ्तरों में चुप्पी और ढिलाई पसरी है।
लगता है जैसे विभाग अब “कमीशन संस्कृति” का स्थायी अड्डा बन चुका है।

💬 एसडीओ शुक्ला का विवादास्पद दावा — “पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पाटन में चार हजार करोड़ का काम किया।”

जब एसडीओ शुक्ला से गुणवत्ता पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने चौंकाने वाला दावा किया —

 “मैंने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पाटन में चार हजार करोड़ का काम किया है, तब अनियमितता नहीं हुई थी, अब कैसे होगी?”

इस बयान ने न केवल वर्तमान कार्य की सच्चाई पर संदेह गहरा किया, बल्कि यह भी उजागर किया कि अफसर खुद को जांच और जवाबदेही से ऊपर समझने लगे हैं।
क्या बड़े कामों का हवाला देना भ्रष्टाचार से मुक्ति का लाइसेंस बन गया है?

📢 पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रघुनंदन साहू ने उठाई आवाज़

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रघुनंदन साहू ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी —

“सड़क निर्माण में शुरू से अब तक लगातार अनियमितता बरती जा रही है, पूरे विभागीय तंत्र की मिलीभगत है, सड़क निर्माण में सभी नियमों और प्राक्कलन को ताक में रखकर एसडीओ और ठेकेदार द्वारा किए गया घोर लापरवाही निश्चित ही  शिकायत किया जाएगा।

करोड़ों रुपये का बजट विकास के नाम पर बंदरबांट किया जा रहा है।
इस पूरे मामले की जांच उच्चस्तरीय स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए और दोषियों को तत्काल निलंबित किया जाए।”

📄 जनता की तीन प्रमुख मांगें : 

1️⃣ सड़क निर्माण की थर्ड पार्टी तकनीकी जांच कराई जाए।
2️⃣ जांच अवधि तक ठेकेदार और एसडीओ दोनों को निलंबित किया जाए।
3️⃣ अब तक हुई शिकायतों और उनकी कार्रवाई रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

🧱 नाली के बाद अब सड़क में लूट — जनता का सब्र टूट रहा है

ग्रामीणों का कहना है कि पहले नाली निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ, अब वही पैटर्न सड़क निर्माण में दोहराया जा रहा है।
जनता की आवाज़ अब दब नहीं रही — गांव–गांव में आक्रोश है।
लोग पूछ रहे हैं कि जब शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही, तो क्या भ्रष्टाचार ही नया प्रशासनिक नियम बन गया है? पूर्व मंत्री और क्षेत्रीय विधायक के क्षेत्र में ऐसी अनियमितता की शिकायत हम हर स्तर पर करेंगे।

❓ जनता के सवाल, जिनका जवाब प्रशासन के पास नहीं 

जब ठेकेदार अफसर का नाम ले रहा है, तो जांच क्यों नहीं शुरू की गई?

जब अफसर ठेकेदार को दोषी बता रहे हैं, तो अनुबंध क्यों नहीं रद्द किया गया?

क्या विभागीय जिम्मेदारी अब सिर्फ बयानबाज़ी और सफाई तक सीमित रह गई है?

📝 संपादकीय: जनता के पैसे पर खेला जा रहा भ्रष्टाचार — विकास नहीं, लूट का खेल _ @सतीश शर्मा, प्रधान संपादक

कुरुद विकासखंड के नारी–गाड़ाडीह मार्ग पर चल रहे सड़क निर्माण कार्य ने छत्तीसगढ़ के विकास के दावों पर सवाल खड़ा कर दिया है। इस परियोजना में न केवल कार्यादेश के नियमों की खुली अवहेलना हो रही है, बल्कि जनता के करोड़ों रुपये का अपमानजनक दुरुपयोग भी हो रहा है। कहीं-कहीं रोलर तक नहीं चलाया जा रहा है, घटिया लाल गिट्टी और खराब मटेरियल का इस्तेमाल आम बात बन गई है, और विभागीय अफसर मौन रहकर इस लूट का समर्थन कर रहे हैं।

स्थानीय ठेकेदार और विभागीय अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते हैं, जबकि जनता हर रोज़ इस घटिया निर्माण की कीमत चुकाती है। ठेकेदार कहता है “अफसर के कहने पर काम किया”, और अफसर जवाब देते हैं “ठेकेदार की गलती है।” इस खेल का सीधा परिणाम यही है कि सड़कों की मजबूती खतरे में, जनता का विश्वास डगमगा रहा है, और सरकारी तंत्र केवल बयानबाज़ी और सफाई तक सीमित रह गया है।

एसडीओ का दावा कि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री के पाटन में बड़े काम किए और वहां अनियमितता नहीं हुई, इस पूरे मामले को जवाबदेही से ऊपर उठाने की तर्कहीन कोशिश है। विकास के बजट का यह गलत उपयोग स्पष्ट करता है कि बड़े ठेके और अनुभव का हवाला देना किसी प्रकार का भ्रष्टाचारमुक्त प्रमाण नहीं बन सकता।

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रघुनंदन साहू के शब्द बिल्कुल सटीक हैं — “यह केवल सड़क की समस्या नहीं, बल्कि पूरे विभागीय सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें हैं। करोड़ों रुपये का बजट विकास के नाम पर बंदरबांट किया जा रहा है।” जनता की मांग साफ़ है: तुरंत थर्ड पार्टी तकनीकी जांच, दोषियों की निलंबन कार्रवाई और सार्वजनिक रिपोर्टिंग।

यदि यही विकास है, तो जनता को सड़क नहीं, साफ़ जवाब चाहिए। जिस मिट्टी पर सड़क डाली जा रही है, वहीं भ्रष्टाचार की गंध उठ रही है। यह मामला केवल सड़क निर्माण का नहीं, यह जनता के विश्वास, सरकारी नैतिकता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रश्न है।

छत्तीसगढ़ सरकार और लोक निर्माण विभाग के लिए यह चेतावनी है कि मौन रहकर और केवल बयान देकर काम नहीं चलेगा। अब समय है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कदम उठाए जाएँ और जनता के पैसे की रक्षा सुनिश्चित की जाए।

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