राज्य गठन से चार वर्ष पूर्व 1995-96 में निर्मित ‘छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर’ बना सांस्कृतिक अस्मिता का प्रथम प्रतीक — आज भी प्रदेश गौरव का केंद्र

@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, कुरूद।

छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस की 25वीं वर्षगांठ पर पूरा प्रदेश जब गौरव के रंग में रंगा है, तब कुरूद का ‘छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर’ एक बार फिर चर्चाओं में है। यह वही धरा है जहाँ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना ने राज्य गठन से चार वर्ष पहले ही मूर्त रूप ले लिया था।

वर्ष 1995-96 में निर्मित यह मंदिर छत्तीसगढ़िया अस्मिता का पहला संस्थागत प्रतीक माना जाता है। राज्य का औपचारिक गठन भले 1 नवंबर 2000 को हुआ, परंतु कुरूद ने इससे पहले ही सांस्कृतिक रूप से ‘छत्तीसगढ़ की आत्मा’ को साकार कर दिया था।

सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक

‘छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर’ प्रदेश का पहला ऐसा धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल है, जहाँ माता को धान की बालियाँ, हसिया और पारंपरिक आभूषणों से अलंकृत किया गया है — जो मातृशक्ति, कृषि और श्रम संस्कृति के अद्वितीय प्रतीक हैं।

मंदिर का शिलान्यास 5 फरवरी 1995 को हुआ और 20 मार्च 1996 को प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। मंदिर निर्माण की प्रेरणा संत पवन दीवान से मिली, जबकि निर्माणकर्ता के रूप में गुरुमुख सिंह होरा ने इसे साकार रूप दिया।

 

प्रतिमा जयपुर से, कलश उड़ीसा से और मुख्य द्वार जगदलपुर से मंगवाया गया — जो इसकी अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन गया।

धान की हर बाली में संस्कृति की महक

हर वर्ष नई फसल आने पर माता का श्रृंगार धान की बालियों से किया जाता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक भावना का प्रतीक है, बल्कि छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति और मातृभूमि के प्रति श्रृद्धा का जीवंत रूप भी है।

मंदिर में लगने वाला वार्षिक भव्य मड़ई मेला हजारों श्रद्धालुओं और लोक कलाकारों का संगम बनता है। यहाँ लोकनृत्य, गीत-संगीत, कथा-परंपरा और पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की विरासत को सजीव रखा जाता है।

राज्य निर्माण के पहले ही छत्तीसगढ़ के पहचान को किया सुदृढ़

मंदिर परिसर में आज भी शिलापट्ट पर उत्कीर्ण शिलालेख इस बात का साक्षी है कि कुरूद ने राज्य निर्माण से पहले ही ‘छत्तीसगढ़’ की पहचान को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार दिया था।

यही वह चेतना थी, जिसने आगे चलकर छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन को भावनात्मक बल प्रदान किया और 1 नवंबर सन 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य अपने स्वतंत्र अस्तित्व में आई।

आज भी जीवित है अस्मिता की ज्वाला

समय बीत चुका है, पर ‘छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर’ आज भी प्रदेश की आत्मा और अस्मिता का प्रतीक स्थल बना हुआ है। यहाँ न केवल श्रद्धा का दीप जलता है, बल्कि छत्तीसगढ़ की मातृभूमि के प्रति गौरव, प्रेम और सांस्कृतिक चेतना का प्रकाश भी सदैव प्रज्वलित रहता है।

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