@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, रायपुर/पटना। बिहार की राजनीति में 14 नवंबर 2025 का दिन निर्णायक मोड़ साबित हुआ। दो चरणों (6 और 11 नवंबर) में हुए दमदार मतदान के बाद आज वोटों की गिनती ने जो तस्वीर उभारी है, उसने वर्षों बाद एक बार फिर सत्ता के समीकरण बदलते हुए दिखाए हैं।

NDA तूफान की तरह उभरकर सामने आया है और रुझानों में ही बहुमत से कहीं आगे निकल चुका है।

NDA का एकतरफा वर्चस्व — बिहार ने दो टूक फैसला सुना दिया

अब तक के रुझानों में एनडीए ने लगभग 190 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाकर चुनाव की दिशा ही बदल दी है।

  • JD(U) लगभग 75+ सीटों पर आगे
  • BJP ने 80 से ऊपर की बढ़त दर्ज की
  • LJP (RV) की 20+ सीटों पर जोरदार पकड़
  • HAM की 4 सीटों पर मजबूत स्थिति

स्पष्ट है कि बिहार की जनता ने एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व को स्वीकार किया है।
उनका सरकार बनाना अब औपचारिकता भर रह गया है।

महागठबंधन की उम्मीदें चकनाचूर — RJD की चुनौती फुस्स साबित

चुनाव अभियान के दौरान जिस आक्रामक तेवर के साथ महागठबंधन मैदान में उतरा था, रुझानों ने वही हवा निकाल दी है।

  • RJD महज 30 के आसपास सीटों पर सिमटती दिख रही
  • कांग्रेस की हालत और खराब, मुश्किल से 5–6 सीटें
  • वाम दलों का प्रदर्शन लगभग नगण्य

कुल मिलाकर महागठबंधन की पूरी ताकत 50 सीटों के आसपास ही अटक गई, जबकि शुरुआती घंटों में जिस लय में उन्होंने बढ़त बनाई थी, वह एनडीए की लहर में पूरी तरह डूब गई।

प्रशांत किशोर का राजनीतिक डेब्यू फीका — जन सुराज को झटका

चुनावी रणनीतिकार से नेता बनी प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।
कई सीटों पर लोकप्रियता का दावा करने के बावजूद पार्टी 1–5 सीटों की संभावित रेंज से बाहर नहीं निकल सकी।
राजनीति में उनका पहला प्रयास यह संकेत दे गया कि भीड़ जुटाना और जनादेश पाना दोनों अलग बातें हैं।

AIMIM व अन्य छोटे दलों का प्रदर्शन भी लगभग शून्य रहा।

बिहार ने दिया स्पष्ट संदेश — स्थिरता चाहिए, प्रयोगवाद नहीं

67% से अधिक रिकॉर्ड मतदान के बाद जिस प्रकार जनता ने एकतरफा फैसला सुनाया, वह साफ दिखाता है कि बिहार ने इस बार
स्थिर शासन, अनुभवी नेतृत्व और सामाजिक संतुलन को तरजीह दी है।
चुनावी शोर में तमाम मुद्दों—रोजगार, महंगाई, जातीय गणित और किसान प्रश्न—के बीच वोटरों की प्राथमिकता स्पष्ट रही।

कुल मिलाकर…

2025 का विधानसभा चुनाव बिहार की राजनीति के कई मिथक तोड़ गया।
जहाँ नीतीश कुमार अपनी पहचान और अनुभव के सहारे एक बार फिर सत्ता के केंद्र में लौट आए,
वहीं विपक्ष के लिए यह जनादेश बड़ा राजनीतिक झटका है।

बिहार का यह फैसला आने वाले वर्षों की राजनीतिक दिशा भी तय कर सकता है।

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