@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, रायपुर। हिंदी साहित्य की दुनिया आज एक अत्यंत संवेदनशील, मौलिक और प्रयोगधर्मी रचनाकार से वंचित हो गई। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल (89 वर्ष) का मंगलवार को रायपुर स्थित एम्स में निधन हो गया। सांस लेने में तकलीफ के चलते उन्हें 2 दिसंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां वे वेंटिलेटर पर ऑक्सीजन सपोर्ट में थे। लंबे उपचार के बावजूद उन्होंने अंतिम सांस ली।

उनके निधन की खबर मिलते ही साहित्य, कला, संस्कृति और अकादमिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। देशभर के लेखकों, कवियों, साहित्यिक संस्थाओं और पाठकों ने इसे हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति बताया है।

सरल शब्दों में गहरे अर्थ रचने वाले लेखक

विनोद कुमार शुक्ल उन विरल रचनाकारों में थे, जिन्होंने साधारण भाषा में असाधारण संवेदना को प्रतिष्ठित किया। उनकी रचनाओं में न तो भाषाई आडंबर था, न ही कथ्य का शोर—बल्कि जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियों का शांत लेकिन गहरा प्रवाह था।

उनकी पहली कविता ‘लगभग जयहिंद’ (1971) ने ही यह संकेत दे दिया था कि हिंदी कविता को एक नई दृष्टि मिलने वाली है।

उपन्यासों ने बदली हिंदी कथा की दिशा

विनोद कुमार शुक्ल केवल कवि नहीं, बल्कि हिंदी के शीर्षस्थ कथाकार भी थे।

उनका उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ (1979) हिंदी साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है, जिस पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणिकौल ने इसी नाम से फिल्म भी बनाई।

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसे उपन्यास ने उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलाया और हिंदी उपन्यास को एक नया सौंदर्यबोध दिया।

उनकी कथाओं में मध्यवर्गीय जीवन, साधारण मनुष्य की अस्तित्वगत बेचैनी, और रोजमर्रा की घटनाओं के भीतर छिपी कविता को असाधारण ढंग से प्रस्तुत किया गया।

आलोचना की नई दृष्टि के प्रेरणास्रोत

आलोचकों का मानना है कि विनोद कुमार शुक्ल अपनी पीढ़ी के उन दुर्लभ लेखकों में थे, जिनके लेखन ने नई आलोचनात्मक दृष्टि को जन्म दिया।

लोक और आधुनिकता, यथार्थ और कल्पना, मौन और संवाद—इन सबका ऐसा संयोजन उनके साहित्य में मिलता है, जो हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर विशिष्ट बनाता है।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान

अपने समग्र साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें प्रमुख हैं—

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • साहित्य अकादमी का सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्य’ (2021)
  • रज़ा पुरस्कार
  • मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान
  • दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान
  • 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार (2024) — समग्र साहित्य के लिए
  • ज्ञानपीठ सम्मान के साथ ही वे हिंदी साहित्य के उस शिखर पर पहुंचे, जहां बहुत कम रचनाकार पहुंच पाते हैं।

कविता, उपन्यास और कहानी—तीनों विधाओं में उनका योगदान अमूल्य रहा।

उनकी कृतियां आज भी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों से लेकर गंभीर साहित्यिक विमर्श का हिस्सा हैं और आने वाली पीढ़ियों को संवेदना की नई भाषा सिखाती रहेंगी।

उनके निधन पर साहित्यकारों ने कहा कि “विनोद कुमार शुक्ल का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की एक पूरी संवेदनशील धारा का थम जाना है।”

छत्तीसगढ़ के लिए वे केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान थे, जिन्होंने इस अंचल को राष्ट्रीय और वैश्विक साहित्य मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया।

विनोद कुमार शुक्ल भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी कविताएं, उपन्यास और कहानियां आने वाली पीढ़ियों से संवाद करती रहेंगी।

हिंदी साहित्य ने एक मौन साधक खो दिया है—जिसकी आवाज़ शब्दों में नहीं, बल्कि संवेदना में गूंजती रहेगी।

Share.

Contact US

सतीश शर्मा
Editor in Chief


Mobile: 9893664533
Email: cglokdarshan@gmail.com
Address: ब्राह्मण पारा, नारी (कुरुद), जिला – धमतरी (छ.ग) 493663

Important Pages

Disclaimer

समाचारों की श्रृंखला में ‘छत्तीसगढ़ लोकदर्शन’ सबसे विश्वसनीय वेब न्यूज पोर्टल है, इसमें देश दुनिया की नवीनतम खबरों के साथ एक वैचारिक चिंतन भी है। ज्ञातव्य हो कि संवाददाताओं द्वारा भेजे गए समाचार की पुष्टि के लिए संपादक या पोर्टल किसी भी तरह उत्तरदायी नहीं है।

© 2025 cglokdarshan.com. Designed by Nimble Technology.

Exit mobile version