व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक साहित्यिक लेख : सतीश शर्मा
मोहन कंसारी : जनजीवन से उठी एक सशक्त काव्य-ध्वनि
छत्तीसगढ़ की मिट्टी से उपजी लोकगंध और जीवन-संघर्ष से तपकर निखरी संवेदना जब शब्दों में ढलती है, तो वह केवल कविता नहीं रहती, बल्कि समाज का दर्पण और युग की आवाज़ बन जाती है। ऐसे ही संवेदनशील और जन-जीवन से जुड़े कवि हैं मोहन कंसारी, जिनका जन्म 24 अगस्त 1981 को धमतरी जिले के ग्राम नारी में हुआ।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और जीवन-संघर्ष
कवि मोहन कंसारी साधारण कृषक-परिवार से आते हैं। पिता श्री भगतराम कंसारी और माता स्वर्गीय श्रीमती गीता देवी से उन्हें संस्कार और जीवन मूल्यों की अनमोल धरोहर मिली। शिक्षा आठवीं तक ही प्राप्त हो पाई, किंतु जीवनानुभवों की पाठशाला ने इन्हें साहित्य का असली अर्थ सिखाया। आज वे न केवल छोटे से किराना व्यवसाय और कृषि से जीवनयापन करते हैं, बल्कि साहित्य की साधना में भी निरंतर सक्रिय हैं।
लेखन यात्रा की शुरुआत
सन् 2012 में ग्राम नारी स्कूल प्रांगण में आयोजित कवि गोष्ठी ने इनके भीतर साहित्य का अंकुर फोड़ा। स्वर्गीय दशरथ लाल निषाद ‘विद्रोही’, पुनुराम साहू ‘राज’ जी जैसे साहित्यकारों की रचनाओं ने मोहन कंसारी को आत्मप्रेरणा दी। पहली कविता “धरती के किसान” सन् 2015 में लिखी गई और तभी से यह यात्रा सतत् प्रवाहित हो रही है।
साहित्यिक पहचान और मंच
सन् 2018 से काव्यगोष्ठियों और कवि-सम्मेलनों में सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराने लगे। 2022 में मोबाइल और सोशल मीडिया से जुड़े, जिससे उन्हें राज्यभर के साहित्यकारों से संपर्क और व्यापक पहचान मिली।
मधुर मिलन साहित्य समिति ग्राम नारी उनके साहित्यिक रचनाधर्मिता की उद्घाटक संस्था रही। जिनके गौरवपूर्ण साहित्यिक आयोजनों ने मोहन कंसारी जैसे अन्यान्य कवियों को सिद्ध हस्त किया, इनके अतिरिक्त आप संगवारी साहित्य समिति (सिर्री), वक्ता मंच (रायपुर), रत्नांचल साहित्य समिति (गरियाबंद) सहित कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। आज प्रदेश में आप प्रतिष्ठित युवा कवियों की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हैं। आप बड़ी सहजता से अपनी रचना धर्मिता को पहचान दिलाने और परिष्कृत करने का श्रेय कवि सतीश शर्मा को देते हैं।
रचनात्मकता और विधाएँ
मोहन कंसारी की रचनाएँ मुख्यतः पद्य में हैं। वे हिंदी और छत्तीसगढ़ी—दोनों भाषाओं में लिखते हैं। उनकी कविताओं के केंद्र में जन-जीवन, राष्ट्रभक्ति, सामाजिक विसंगतियाँ, पारिवारिक मूल्य और प्रेम जैसे सार्वकालिक विषय हैं। साथ ही, वे लघुकथा और आलेख लेखन की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं।
साहित्यिक दृष्टि और भावभूमि
उनकी कविताएँ आत्मानुभूति और समाजोपयोगिता दोनों का संगम हैं। उदाहरणार्थ—
“मातृभूमि की सेवा खातिर” जैसी रचनाएँ सैनिकों की शौर्यगाथा और राष्ट्रप्रेम को ऊँचाई देती हैं।
“मेरा लक्ष्य” संघर्षशील जीवन और आत्मविश्वास को स्वर देती है।
“भरत जैसा भाई” जैसी रचना राम-भरत के भाईचारे को आधुनिक जीवन-मूल्यों से जोड़ती है।
वहीं छत्तीसगढ़ी कविता “नशा पान” सीधे-सीधे ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं पर चोट करती है और सामाजिक जागरण का आह्वान करती है।
इनकी कविताएँ सरल भाषा, स्पष्ट बिंब और सहज प्रवाह के कारण सीधे जनमानस को स्पर्श करती हैं।
व्यक्तित्व : सहज, संघर्षशील और प्रतिबद्ध
मोहन कंसारी का व्यक्तित्व उनकी कविताओं की तरह ही सहज और संघर्षशील है। वे साहित्य को केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं मानते, बल्कि समाज सेवा और संस्कारों का विस्तार मानते हैं। परिवार को ही अपना आदर्श मानने वाले कवि अपने जीवन को साहित्यिक साधना के रूप में जी रहे हैं। पुरस्कार और सम्मान—काव्यश्री, शब्द शिल्पी, विश्व हिंदी रचनाकार सम्मान, सुंदरलाल शर्मा सम्मान आदि—ने उन्हें नई ऊर्जा दी है, किंतु उनके लिए असली उपलब्धि पाठकों का स्नेह और परिवार का सहयोग है।
साहित्यिक मूल्यांकन
कवि मोहन कंसारी की कविताओं में लोक जीवन की सच्चाई, राष्ट्रप्रेम की आस्था और सामाजिक चेतना की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है। छत्तीसगढ़ी और हिंदी दोनों में समान अधिकार से लिखना उनके कृतित्व की व्यापकता को दर्शाता है। वे न तो केवल भावुक कवि हैं, न ही केवल उपदेशात्मक; बल्कि उनकी कविताएँ संघर्ष और आशा के बीच पुल का कार्य करती हैं।
निष्कर्ष:
मोहन कंसारी का साहित्यिक कृतित्व यह प्रमाणित करता है कि शिक्षा की औपचारिक सीमाएँ सृजन के मार्ग में बाधा नहीं होतीं। संवेदनशील हृदय, परिवार का संस्कार और समाज से जुड़ाव ही उन्हें एक सशक्त कवि के रूप में प्रतिष्ठित करता है। वे जनकवि की उस परंपरा के कवि हैं, जिनकी कलम सीधे गाँव-गिरौह, खेत-खलिहान और समाज की नब्ज़ से संवाद करती है।
भविष्य में उनकी रचनात्मकता और गहरी होगी—क्योंकि मोहन कंसारी केवल कवि नहीं, बल्कि समाज की चेतना के वाहक हैं।
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