@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, नवापारा राजिम। सालासर सुंदरकांड हनुमान चालीसा जनकल्याण समिति के तत्वावधान में आयोजित श्रीराम कथा में श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। अयोध्या से पधारे श्रीराम कथा के सुप्रसिद्ध प्रवक्ता परम पूज्य प्रशांत जी महाराज के मुखारविंद से भक्त केवट की पावन कथा एवं भरत चरित्र का भावपूर्ण वर्णन हुआ, जिसे सुनकर श्रोता भावविभोर हो उठे।
केवट की भक्ति ने पाया मोक्ष का वरदान
महाराज जी ने श्रीराम के वनगमन प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि भगवान अयोध्या से निकलकर तमसा तट पर रुके और आगे श्रृंगवेरपुर पहुँचे, जहाँ उनके मित्र निषादराज गुह मिले। गंगा पार कराने के लिए केवट को बुलाया गया, परंतु केवट ने विनम्रता के साथ नाव देने से इनकार करते हुए अपनी शर्त रखी।
केवट ने कहा—“प्रभु, आपके चरणों की रज से पत्थर की शिला नारी बन गई, यदि मेरी लकड़ी की नाव भी स्त्री बन गई तो मेरे परिवार का पालन-पोषण कैसे होगा?”
इसलिए उसने भगवान के चरणों का प्रक्षालन करने के बाद ही नाव पर बैठाने की बात कही।
भगवान श्रीराम ने उसकी निष्कपट भक्ति स्वीकार की। केवट ने श्रद्धापूर्वक चरण धोकर चरणामृत अपनी पत्नी और बच्चों को पिलाया। गंगा पार कराने के बाद जब भगवान ने उतराई देनी चाही तो केवट ने विनम्रता से इंकार करते हुए कहा—
“प्रभु, आप भवसागर पार कराते हैं और मैं गंगा पार कराता हूँ, मुझमें और आपमें क्या अंतर?”
केवट की इस अद्भुत भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति का आशीर्वाद प्रदान किया। महाराज जी ने कहा कि यह प्रसंग सिद्ध करता है कि सच्ची श्रद्धा और निष्काम भक्ति से सामान्य व्यक्ति भी ईश्वर की कृपा पा सकता है।
भरत चरित्र : त्याग, निष्ठा और आदर्श का प्रतीक
कथा के दूसरे प्रसंग में परम पूज्य प्रशांत जी महाराज ने भरत चरित्र पर प्रकाश डालते हुए रामचरितमानस की चौपाई का उल्लेख किया—
“सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ॥”
महाराज जी ने बताया कि जीवन-मरण, लाभ-हानि सब ईश्वर की इच्छा से होते हैं। भरत का चरित्र त्याग, निष्ठा और आदर्श भाईचारे का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कैकेयी के कहने पर भी राज्य स्वीकार नहीं किया और राजसिंहासन का त्याग कर भाई राम के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण का परिचय दिया।
गुरु वशिष्ठ और मंत्रियों के साथ चित्रकूट जाकर राम को लौटाने का प्रयास, खड़ाऊँ को सिंहासन पर स्थापित करना—भरत का यह आचरण आज भी समाज को स्वार्थ और परमार्थ के संतुलन की प्रेरणा देता है।
“भाई का रिश्ता संपत्ति नहीं, विपत्ति बाँटने का होता है”
महाराज जी ने कहा कि श्रीरामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि जीने की कला सिखाती है। भाई-भाई का संबंध संपत्ति बाँटने के लिए नहीं, बल्कि विपत्ति बाँटने के लिए होता है—यह संदेश भरत चरित्र से स्पष्ट होता है।
दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु
कथा श्रवण के दौरान पूरा पंडाल श्रद्धा और भक्ति से सराबोर रहा। आज के मुख्य यजमान मनोज बबलू विश्वकर्मा, श्रीमती पुष्पलता विश्वकर्मा एवं परिवार रहे।
बालोद, गुरुर, रायपुर, राजिम, अभनपुर, पारागांव, तरी, पटेवा, पिपरौद, छांटा, नवापारा सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा सुनने पहुँचे।
कथा के समापन पर श्रोताओं ने कहा कि भक्त केवट और भरत चरित्र ने उन्हें जीवन में त्याग, सेवा और सच्ची भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
