रेत माफियाओं की मनमानी या सिस्टम की मेहरबानी? कथित साठगांठ के आरोपों से मचा सवालों का तूफान
कलेक्टर और खनिज अधिकारी बोले—जानकारी नहीं, तत्काल जांच दल भेजने का आश्वासन; क्षेत्रीय विधायक अजय चंद्राकर की चुप्पी पर भी सवाल
@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, कुरूद। रेत का अवैध खनन बदस्तूर जारी है, जिम्मेदार विभाग को भनक तक नहीं और जनता के मन में एक ही सवाल—आखिर किसके भरोसे चल रहा है रेत का यह पूरा खेल? खट्टी–नारी क्षेत्र में कथित अवैध रेत उत्खनन को लेकर उठ रहे सवालों ने प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार चल रहा है, तो सवालों का जवाब देने में परेशानी क्यों? और यदि अवैध खनन हो रहा है, तो जिम्मेदार विभाग अब तक क्या कर रहा है?
स्थानीय स्तर पर इस पूरे मामले को लेकर माफियाओं, कुछ जनप्रतिनिधियों और विभागीय तंत्र के बीच कथित साठगांठ के आरोप चर्चा में हैं। आरोप है कि गांव के कुछ कथित बिचौलियों तक पैसे पहुंचने के कारण रेत के इस कारोबार पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। आम लोगों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर किसकी शह पर नियम-कायदों को ताक पर रखकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है?
रेत का उत्खनन जारी, जिम्मेदार अधिकारी और कलेक्टर झाड़ते हैं पल्ला
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कलेक्टर और खनिज अधिकारी से संपर्क करने पर उन्होंने मामले की जानकारी नहीं होने की बात कही। अधिकारियों ने तत्काल जांच दल भेजने का आश्वासन दिया है।
लेकिन सवाल यह है कि जब क्षेत्र में रेत खनन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, तो संबंधित विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर किस काम की है? क्या विभाग केवल शिकायत मिलने के बाद ही जागता है? क्या खनिज विभाग के पास अपने क्षेत्र में होने वाली खनन गतिविधियों की नियमित जानकारी रखने की कोई व्यवस्था नहीं है?
अधिकारियों का यह कहना कि जानकारी नहीं है, अब जवाबदेही से बचने का आधार नहीं बन सकता। जनता को आश्वासन नहीं, मौके पर कार्रवाई चाहिए।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच दल वास्तव में कब पहुंचता है, क्या कार्रवाई करता है और जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाते हैं या नहीं।
किसके पास पहुंचता है पैसा, किसके इशारे पर चलता है कारोबार?
स्थानीय स्तर पर उठ रहे आरोपों के केंद्र में कथित बिचौलियों की भूमिका भी है। चर्चा है कि कुछ लोग इस पूरे कारोबार में प्रभाव रखते हैं और कथित आर्थिक लेन-देन के कारण विरोध या कार्रवाई की स्थिति पैदा नहीं होने दी जाती।
यदि इस तरह का कोई नेटवर्क सक्रिय है, तो उसका खुलासा होना चाहिए। आखिर रेत का उत्खनन कौन कर रहा है? परिवहन कौन कर रहा है? खनन की अनुमति किनके पास है? और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो उसे रोकने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की है, वे अब तक क्या कर रहे हैं?
यह केवल रेत निकालने का मामला नहीं है। यह प्राकृतिक संसाधनों, सरकारी राजस्व और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके क्षेत्र में क्या हो रहा है और जिम्मेदार तंत्र अपनी भूमिका कितनी गंभीरता से निभा रहा है।
विधायक अजय चंद्राकर की चुप्पी पर सवाल—आखिर कब उठेगी आवाज?
प्रत्येक गंभीर मामले में मुखर रहने वाले स्पष्ट कार्यशैली के लिए जानने वाले क्षेत्रीय विधायक जानकारी के बावजूद कुछ नहीं कर पा रहे हैं। खट्टी–नारी के इस गंभीर मामले में क्षेत्रीय विधायक अजय चंद्राकर की भूमिका को लेकर भी लोगों में काफी नाराजगी है। क्षेत्र के मुद्दों पर मुखर रहने वाले विधायक की ओर से इस मामले में क्या पहल की गई है? क्या उन्होंने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है? क्या उन्होंने खनिज विभाग को मौके पर जांच कराकर कार्रवाई करने के लिए कहा है?
यदि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है, तो जनता तक यह मुद्दा पहुंचाने और प्रशासन से जवाब मांगने की पहल कौन करेगा? और यदि जानकारी है, तो अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?
जनता यह जानना चाहती है कि जब क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब जनप्रतिनिधियों की ओर से जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जा रहा है।
यह किसी व्यक्ति विशेष पर दोष तय करने का सवाल नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी का सवाल है। क्षेत्र की जनता को इस मामले में स्पष्ट जवाब और ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है।
सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा है इसका जिम्मेदार कौन?
अवैध खनन का सीधा संबंध सरकारी राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से है। यदि बिना वैध अनुमति या निर्धारित सीमा से बाहर रेत निकाली जा रही है, तो शासन को मिलने वाले राजस्व पर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही पर्यावरण और स्थानीय क्षेत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
ऐसे में खनिज विभाग को केवल मौके का निरीक्षण कर लौटने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जांच में खनन की वैधता, अनुमति की शर्तों, रॉयल्टी, परिवहन दस्तावेजों और उत्खनन की वास्तविक स्थिति की पड़ताल होनी चाहिए। नियमों का उल्लंघन मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई और संभावित राजस्व क्षति का आकलन भी किया जाना चाहिए।
गांव के कथित दलालों की दबंगई पर सवाल—आखिर किसकी शह पर चल रहा है पूरा खेल?
खट्टी–नारी में रेत के कथित अवैध कारोबार को लेकर गांव के कुछ बिचौलियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि ये लोग खुद को ऐसा प्रभावशाली समझते हैं, मानो गांव के प्राकृतिक संसाधनों पर उन्हीं का अधिकार हो और कानून उनके सामने कोई मायने ही न रखता हो। कथित तौर पर पैसों के लेन-देन और रसूख के दम पर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जिसमें कोई सवाल उठाने या रोक-टोक करने की हिम्मत न करे।
आखिर ये कथित दलाल हैं कौन, जिन्हें कानून का भय नहीं दिखाई देता? इनके पीछे किसका संरक्षण है और रेत के इस कथित कारोबार से किस-किस को लाभ पहुंच रहा है?
गांव की संपदा पर अपना प्रभाव जमाकर यदि कोई व्यक्ति खुद को कानून से ऊपर समझता है, तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधन किसी की निजी जागीर नहीं हैं। गांव की मिट्टी, रेत और जलस्रोतों पर मनमानी करने का अधिकार किसी को नहीं है। यदि किसी की भूमिका अवैध खनन को बढ़ावा देने, कथित वसूली करने या कार्रवाई में बाधा डालने में सामने आती है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोष साबित होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गांव के कुछ कथित बिचौलियों के इशारे पर पूरा कारोबार चलने की बात सामने आ रही है, तो प्रशासन उनकी भूमिका की जांच करने से पीछे क्यों रहे? क्या कानून केवल आम आदमी के लिए है, या रसूखदारों और उनके कथित मददगारों पर भी समान रूप से लागू होगा?
अब वक्त आ गया है कि इस पूरे मामले की परतें खोली जाएं। कथित बिचौलियों की भूमिका, आर्थिक लेन-देन और उनके संपर्कों की जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आए। गांव की जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से किसे फायदा हो रहा है और इसकी कीमत आखिर कौन चुका रहा है।
अब आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए !
कलेक्टर और खनिज अधिकारी ने तत्काल जांच दल भेजने की बात कही है। अब प्रशासन के सामने अपनी कार्यप्रणाली साबित करने का अवसर है। जांच दल कब पहुंचेगा? क्या मौके पर वास्तविक स्थिति की जांच होगी? क्या जिम्मेदारों की पहचान होगी? क्या अवैध उत्खनन पर रोक लगेगी? और क्या जांच के निष्कर्ष जनता के सामने रखे जाएंगे?
इन सवालों से बचकर अब काम नहीं चलने वाला। यदि सब कुछ नियमानुसार है, तो विभाग तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करे। यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो कार्रवाई करके दिखाए।
खट्टी–नारी की जनता को केवल यह सुनने में दिलचस्पी नहीं है कि अधिकारियों को जानकारी नहीं थी। जनता जानना चाहती है कि जानकारी मिलने के बाद क्या किया गया।
रेत किसी की निजी जागीर नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों पर मनमानी, सरकारी राजस्व की अनदेखी और प्रशासनिक निष्क्रियता के आरोपों को गंभीरता से लेना ही होगा। अब निगाहें जांच दल पर हैं—क्या वह रेत के इस कथित खेल की वास्तविक तस्वीर सामने लाएगा, या कार्रवाई का आश्वासन देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—खट्टी–नारी में रेत का यह खेल आखिर कब रुकेगा और जिम्मेदारों की जवाबदेही कब तय होगी?








