@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, रायपुर/दुर्ग। छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे भारत की लोक सांस्कृतिक विरासत के लिए आज का दिन अत्यंत दुःखद और अपूरणीय क्षति का दिन है। पंडवानी गायन को गांव की चौपाल से उठाकर विश्व मंच तक पहुंचाने वाली, पद्म विभूषण से सम्मानित महान लोक कलाकार तीजन बाई का आज प्रातः लगभग 3:15 बजे रायपुर एम्स में उपचार के दौरान निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं। उनके निधन से कला, साहित्य, संस्कृति और लोक परंपरा से जुड़े करोड़ों लोगों के बीच शोक की लहर दौड़ गई है।

देर रात मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उनके परिजनों से दूरभाष पर चर्चा कर स्वास्थ्य की जानकारी ली थी, किंतु सुबह उनके निधन का दुखद समाचार सामने आया। उनकी पार्थिव देह का अंतिम संस्कार उनके पैतृक क्षेत्र गनियारी गांव में पूरे रीति-रिवाज के साथ किया जाएगा।
गरीबी से विश्व मंच तक का अद्भुत सफर

8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड के अटारी गांव में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की अद्वितीय मिसाल रहा। तीज पर्व के दिन जन्म लेने के कारण उनका नाम “तीजन” रखा गया। माता सुखवती देवी और पिता हुनुकलाल पारधी की पहली संतान तीजन बाई का बचपन अभावों में बीता, लेकिन संगीत उनके जीवन की धड़कन बन गया।
कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने अपने नाना को पंडवानी गाते सुना और उसी क्षण तय कर लिया कि यही उनकी साधना होगी। मात्र नौ वर्ष की आयु में उन्होंने अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी की शिक्षा प्रारंभ की।
समाज के विरोध के सामने कभी नहीं झुकीं
उस दौर में पारधी समाज की महिलाओं का सार्वजनिक मंच पर पंडवानी गाना सामाजिक परंपराओं के विरुद्ध माना जाता था। तीजन बाई को समाज और परिवार के विरोध का सामना करना पड़ा, यहां तक कि उन्हें घर से भी निकाल दिया गया। उनके वैवाहिक जीवन पर भी इसका असर पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी कला का साथ कभी नहीं छोड़ा।
महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने चंदखुरी के सतीचौरा चौक में पहला सार्वजनिक मंचन किया। उनकी प्रभावशाली शैली, दमदार आवाज और अभिनय ने शीघ्र ही उन्हें गांवों से निकालकर राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया।
महाभारत को जीवंत कर देती थी उनकी आवाज

तीजन बाई की प्रस्तुति केवल गायन नहीं होती थी, बल्कि महाभारत का सजीव मंचन बन जाती थी। विशेष रूप से ‘दुशासन वध’ का उनका प्रसंग देश-विदेश में अत्यंत लोकप्रिय हुआ। उनके एकतारे की धुन, प्रभावशाली संवाद और अभिनय दर्शकों को भाव-विभोर कर देते थे।
उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, तुर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया, मॉरीशस सहित अनेक देशों में भारत और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का परचम लहराया। वे वास्तव में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजदूत थीं।
सम्मानों से सजा गौरवपूर्ण जीवन
लोक संस्कृति के संरक्षण और पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया—
- पद्मश्री (1988)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
- पद्म भूषण (2003)
- नृत्य शिरोमणि सम्मान (2007)
- खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट. (2017)
- पद्म विभूषण (2019)
- जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार
- चार मानद डी.लिट. उपाधियां
छत्तीसगढ़ की आत्मा थीं तीजन बाई
तीजन बाई केवल एक लोक गायिका नहीं थीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की जीवंत पहचान थीं। उन्होंने महिला सशक्तिकरण, साक्षरता और लोककलाओं के संरक्षण के लिए भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी कला ने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा सामाजिक बंधनों से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है।
आज उनका स्वर भले ही मौन हो गया हो, लेकिन उनकी पंडवानी, उनका संघर्ष और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। छत्तीसगढ़ की माटी ने अपनी सबसे अनमोल सांस्कृतिक धरोहरों में से एक को खो दिया है।
स्मृतियों में अमर रहेंगी तीजन बाई: जब लोक संस्कृति की महानायिका ग्राम नारी पहुंचीं और साझा किए थे अपने मन के भाव
@ सतीश शर्मा, संपादक, जयति लोकदर्शन
आज जब पद्म विभूषण तीजन बाई हमारे बीच नहीं रहीं, तब उनकी यादों का एक अनमोल अध्याय बरबस आंखों के सामने ताज़ा हो जाता है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब भाजपा प्रत्याशी चंदूलाल साहू के चुनाव प्रचार के सिलसिले में तीजन बाई ग्राम नारी पहुंची थीं, तब मुझे, एक संवाददाता के रूप में, उनका साक्षात्कार लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
वह केवल एक चुनावी सभा नहीं थी, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का एक जीवंत उत्सव था। हजारों लोगों के बीच जब तीजन बाई मंच पर पहुंचीं तो ऐसा लगा मानो महाभारत स्वयं गांव की धरती पर उतर आया हो। उनकी दमदार आवाज़, भावपूर्ण अभिनय और सहज व्यक्तित्व ने हर श्रोता को मंत्रमुग्ध कर दिया।
साक्षात्कार के दौरान तीजन बाई ने अत्यंत सहजता से कहा था कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और अपनी संस्कृति को जीवित रखने का सबसे बड़ा माध्यम है। उनके शब्दों में अपनी मिट्टी के प्रति गहरा प्रेम और लोक परंपराओं के संरक्षण का अद्भुत संकल्प झलकता था।
उस दिन यह अनुमान लगाना भी कठिन था कि एक दिन यही साक्षात्कार जीवन की अमूल्य स्मृतियों में शामिल हो जाएगा। आज जब उनका स्वर सदा के लिए शांत हो गया है, तब वही मुलाकात पत्रकारिता जीवन की सबसे बड़ी धरोहर बन गई है।
तीजन बाई ने संघर्षों को सीढ़ी बनाकर पंडवानी को गांव की चौपाल से उठाकर विश्व मंच तक पहुंचाया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी जाति, वर्ग या आर्थिक परिस्थिति की मोहताज नहीं होती। पद्मश्री, पद्म भूषण और अंततः पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मानों से सम्मानित होकर भी वे हमेशा अपनी माटी से जुड़ी रहीं।
आज छत्तीसगढ़ ने अपनी सांस्कृतिक आत्मा का एक अमूल्य स्वर खो दिया है। किंतु उनकी पंडवानी, उनका संघर्ष, उनकी सादगी और उनकी अमर आवाज़ सदियों तक आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी।
जयति लोकदर्शन राष्ट्रीय मासिक समाचार पत्रिका परिवार एवं छत्तीसगढ़ लोकदर्शन समाचार पोर्टल की ओर से पद्म विभूषण तीजन बाई को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिजनों और असंख्य प्रशंसकों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति दें।








