मासूम की जान गई, लेकिन सवाल सिर्फ ट्रैक्टर चालक तक सीमित नहीं, गांव की रेत दूसरे गांवों तक कैसे पहुंच रही थी? माइनिंग विभाग और स्थानीय प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, कुरूद। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर ग्राम नारी में चार वर्षीय मासूम फनिश सोनी की दर्दनाक मौत ने पूरे गांव को झकझोर दिया। रेत से लदे ट्रैक्टर की चपेट में आने से मासूम की जान चली गई। हादसे के बाद ग्रामीणों का आक्रोश सड़कों पर दिखाई दिया और स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
यह घटना केवल एक सड़क हादसा नहीं है। इसके पीछे गांव की सड़कों पर लगातार दौड़ते रेत से भरे ट्रैक्टरों, रेत के उत्खनन और परिवहन तथा प्रशासनिक निगरानी को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?
यदि रेत से भरा ट्रैक्टर वैध तरीके से परिवहन कर रहा था तो उसके पास वैध रॉयल्टी/परिवहन दस्तावेज, अनुमति और निर्धारित परिवहन संबंधी कागजात थे या नहीं—इसकी जांच होनी चाहिए। इनके पास तो कोई भी दस्तावेज और आदेश तो बिलकुल ही नहीं था, कोकड़ी और नारी के प्रभावशाली लोग आपस में मिलकर अवैध डंप करा रहे थे
डंप और परिवहन अवैध था तो सवाल और बड़ा है—इतने दिनों से यह व्यवस्था किसकी नजर के सामने चल रही थी?
क्या माइनिंग विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी?
क्या स्थानीय प्रशासन को इसकी भनक नहीं थी?
क्या ग्रामीण नेतृत्व ने कभी इस पर रोक लगाने का प्रयास किया?
और यदि प्रयास किया गया था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मासूम की मौत के बाद इन सवालों का जवाब देना जरूरी है।
गांव की रेत दूसरे गांव में रेत किसके संरक्षण में पहुंचा रहा था?
ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी चर्चा में है कि यदि रेत ग्राम नारी क्षेत्र से निकल रही थी, तो उसे दूसरे गांवों में डंप अथवा पहुंचाने की अनुमति और व्यवस्था आखिर किस आधार पर थी?
किसी भी व्यक्ति या वाहन को केवल इसलिए रेत ले जाने का अधिकार नहीं मिल जाता कि वह किसी दूसरे गांव का निवासी है। मेरे गांव का रेत बिना गांव वाले की सहमति से कैसे दूसरे गांव पहुंच सकता है। दूसरे गांव के लोग नारी क्षेत्र की रेत लेकर अपने गांव में डंप कर रहे थे, तो प्रशासन अभी तक अवैध डंप पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है। यह स्पष्ट करना चाहिए।
‘ग्रामीण हस्तक्षेप नहीं’ तो फिर निगरानी किसकी?
यह भी जांच का विषय है कि यदि बाहर के लोग गांव की रेत लेकर दूसरे गांवों में पहुंचा रहे थे, तो स्थानीय स्तर पर इसकी जानकारी किसे थी और किसने उन्हें रोकने का प्रयास किया।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होनी चाहिए— रेत परिवहन रोकना या अनुमति देना किसी व्यक्ति विशेष अथवा तथाकथित नामचीन ग्रामीण की निजी शक्ति नहीं हो सकती। कानून और खनिज नियमों का पालन कराना प्रशासन एवं संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
इसीलिए जांच केवल ट्रैक्टर चालक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। रेत के स्रोत से लेकर अंतिम डंपिंग स्थल तक पूरी कड़ी की जांच होनी चाहिए।
नामचीन ग्रामीणों की भूमिका भी जांच के दायरे में आए
ग्रामीणों के बीच यदि किसी प्रभावशाली या नामचीन व्यक्ति पर रेत के उत्खनन, परिवहन अथवा डंपिंग को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं, तो उन आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
यह किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का मामला नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाने का सवाल है।
यदि कोई निर्दोष है तो जांच उसे भी साफ-साफ निर्दोष साबित करेगी।
लेकिन यदि किसी की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
माइनिंग विभाग की जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण
मासूम की मौत के बाद अब सिर्फ चालक पर कार्रवाई कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रशासन को यह पता लगाना होगा कि दुर्घटना में शामिल ट्रैक्टर कहां से रेत लेकर आया था और कहां जा रहा था।
साथ ही पिछले कुछ समय में क्षेत्र से बाहर ले जाई गई रेत के परिवहन की जांच, संबंधित वाहनों के दस्तावेजों की जांच और डंपिंग स्थलों का सत्यापन किया जाना चाहिए।
अगर सब कुछ वैध था तो प्रशासन दस्तावेज सार्वजनिक करे।
अगर अवैध था तो जिम्मेदारों तक कार्रवाई पहुंचे।
परिवार को न्याय चाहिए, गांव को जवाब
जिस परिवार ने रक्षाबंधन के दिन अपना चार वर्षीय मासूम खोया है, उसके दुख की भरपाई कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। फिर भी न्याय व्यवस्था से परिवार की एक उम्मीद जरूर है—जिस गलती या लापरवाही से यह हादसा हुआ, उसकी पूरी सच्चाई सामने आए।
ग्रामीणों से भी अपील है कि आक्रोश स्वाभाविक है, लेकिन कानून अपने हाथ में लेना समाधान नहीं है। दोषी कौन है, यह जांच और कानून तय करे।








