हादसा आंखों के सामने देखकर भी नहीं रुके जिला पंचायत उपाध्यक्ष—जनपद सदस्य के गृहग्राम में मातम, फिर भी नहीं पहुंचे; विधायक प्रतिनिधि भी गायब, ग्रामीणों में भारी आक्रोश
@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, कुरूद। रक्षाबंधन के दिन ग्राम नारी में चार वर्षीय मासूम की दर्दनाक मौत ने पूरे गांव को हिला दिया। रेत से भरे ट्रैक्टर की चपेट में आकर मासूम की जान चली गई। घटना के बाद गांव में आक्रोश, तनाव और मातम का माहौल है। लेकिन इस त्रासदी के बीच ग्रामीणों का गुस्सा अब सिर्फ हादसे तक सीमित नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता पर भी फूट रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार घटना के समय जिला पंचायत उपाध्यक्ष वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने कार का शीशा खोलकर घटनास्थल की ओर देखा, लेकिन रुककर स्थिति जानने, पीड़ित परिवार के पास जाने या ग्रामीणों से बात करने की जरूरत तक महसूस नहीं की। यह दृश्य ग्रामीणों के लिए बेहद पीड़ादायक रहा।
आंखों के सामने मौत… फिर भी कार नहीं रुकी!
ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधि का पहला दायित्व संकट की घड़ी में जनता के साथ खड़ा होना है। लेकिन यहां एक मासूम की मौत के बाद भी यदि जनप्रतिनिधि घटनास्थल देखकर आगे निकल जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या जनप्रतिनिधित्व केवल कार्यक्रमों में दिखाई देने और उपलब्धियों की तस्वीरें खिंचवाने तक सीमित रह गया है?
हादसे के बाद अब तक पीड़ित परिवार से संपर्क नहीं किए जाने की बात भी ग्रामीणों में गहरी नाराजगी पैदा कर रही है।
जनपद सदस्य का गृहग्राम, फिर भी पीड़ित परिवार तक नहीं पहुंचे!
सबसे ज्यादा सवाल उस जनपद सदस्य की भूमिका पर उठ रहे हैं, जिनका गृहग्राम ही नारी है। ग्रामीणों के मुताबिक इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी उन्होंने मृतक परिवार से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त नहीं की।
ग्रामीण पूछ रहे हैं—
जब गांव में छोटी-छोटी उपलब्धियों का श्रेय लेने का समय आता है, तब जनप्रतिनिधि सबसे आगे नजर आते हैं, लेकिन जब किसी गरीब परिवार के घर का चिराग बुझ जाता है, तब वही चेहरे कहां गायब हो जाते हैं?
विधायक के प्रतिनिधि भी नहीं पहुंचे!
ग्रामीणों के मुताबिक क्षेत्रीय विधायक या उनके किसी प्रतिनिधि द्वारा भी अभी तक पीड़ित परिवार से संपर्क नहीं किया गया है। चार साल के मासूम की मौत के बाद परिवार को सांत्वना देने के लिए किसी जिम्मेदार राजनीतिक प्रतिनिधि का नहीं पहुंचना ग्रामीणों को अखर रहा है।
यह राजनीतिक विरोध का नहीं, मानवीय संवेदना का सवाल है।
छोटे कामों में फोटो, बड़े दुख में दूरी क्यों?
ग्रामीणों का आक्रोश इसलिए और बढ़ रहा है क्योंकि उनका आरोप है कि गांव में छोटे-छोटे कार्यों का श्रेय लेने, लोकार्पण या निरीक्षण के नाम पर फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता बटोरने के लिए जनप्रतिनिधि तत्काल पहुंच जाते हैं।
लेकिन जब एक मासूम की जान चली गई, परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और पूरा गांव सदमे में है—तब वही जनप्रतिनिधि दिखाई क्यों नहीं दे रहे?
यह सवाल अब गांव की चौपाल से लेकर आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
20 साल से रेत के कारोबार पर राजनीति चमकाने का आरोप
ग्रामीणों के बीच सबसे गंभीर आरोप उन लोगों को लेकर भी हैं, जिन पर पिछले करीब 20 वर्षों से ग्राम नारी में रेत के कारोबार के जरिए राजनीति चमकाने के आरोप लगते रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि रेत का कारोबार, उसका परिवहन और उससे जुड़ी राजनीति कोई नई बात नहीं है। यदि वर्षों से क्षेत्र में रेत की आवाजाही और कथित अवैध गतिविधियों की शिकायतें होती रही हैं, तो जिम्मेदार विभाग और स्थानीय नेतृत्व ने समय रहते कठोर कदम क्यों नहीं उठाए?
आज एक मासूम की मौत के बाद वही सवाल खून के आंसू बनकर सामने खड़ा है।
हालांकि किसी व्यक्ति विशेष को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन जिन लोगों पर ग्रामीण आरोप लगा रहे हैं, उनकी भूमिका की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होना जरूरी है।
अब संवेदना नहीं तो कम से कम जवाबदेही तो हो
पीड़ित परिवार को राजनीतिक भाषण नहीं चाहिए। उसे इस समय सहानुभूति, न्याय और सुरक्षा का भरोसा चाहिए।
प्रशासन को यह भी जांचना चाहिए कि हादसे में शामिल ट्रैक्टर कहां से रेत लेकर आया था, रेत वैध थी या अवैध, वाहन के पास आवश्यक दस्तावेज थे या नहीं और गांव की सड़कों पर ऐसे वाहनों की आवाजाही पर निगरानी कौन कर रहा था।
ग्रामीणों का सीधा सवाल—जनप्रतिनिधि किसके लिए हैं?
मासूम की मौत ने नारी में सिर्फ एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे गांव को झकझोर दिया है। ऐसे समय में जनता अपने जनप्रतिनिधियों से उम्मीद करती है कि वे दुख की घड़ी में साथ खड़े होंगे।
लेकिन घटना के बाद अब तक प्रमुख जनप्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी ने ग्रामीणों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है।
छत्तीसगढ़ लोकदर्शन का सवाल बेहद सीधा है—
जब वोट मांगने के लिए जनता के दरवाजे तक पहुंचने में देर नहीं लगती, तो मासूम की मौत के बाद उसी परिवार के दरवाजे तक पहुंचने में इतनी देर क्यों?
जब छोटी उपलब्धियों पर फोटो खिंचवाने के लिए भीड़ जुट सकती है, तो एक उजड़े परिवार के आंसू पोंछने के लिए एक प्रतिनिधि क्यों नहीं पहुंचा?
मासूम की मौत राजनीति का अवसर नहीं, मानवता की परीक्षा है।
अब नारी की जनता देख रही है—
कौन उनके दुख में खड़ा होता है और कौन सिर्फ कैमरे के सामने जनता के साथ दिखाई देता है।








