समाचार सार
धमतरी के नगरी ब्लॉक स्थित पांवद्वार प्राथमिक शाला का भवन पूरी तरह जर्जर और खतरनाक हो चुका है।
छत से पानी टपकता है और दीवारों में दरारें हैं, बच्चे मौत के साये में पढ़ने को मजबूर।
वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर बच्चों को गांव के खुले रंगमंच पर पढ़ाया जा रहा है।
शिक्षा विभाग ने एक कमरे की स्वीकृति दी, पर दो और कमरों का प्रस्ताव अब भी लंबित है।
@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन धमतरी/नगरी। जहां एक ओर सरकार ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ का नारा देती है, वहीं छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी दर्दनाक तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों की पोल खोल रही है। यहां एक सरकारी स्कूल का भवन इतना जर्जर हो चुका है कि उसे कभी भी ढह जाने का खतरा है, जिसके चलते मासूम बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर गांव के एक खुले रंगमंच पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।
मौत के साये में स्कूल: दीवारों में दरारें, छत से टपकता पानी
यह मामला नगरी ब्लॉक मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत पांवद्वार के प्राथमिक शाला का है। इस स्कूल में कक्षा 1 से 5 तक के 56 बच्चे पढ़ते हैं, जिन्हें पढ़ाने के लिए सिर्फ 2 शिक्षक नियुक्त हैं। गांव के सरपंच राकेश नेताम के अनुसार,
- स्कूल का खपरैल-टाइल वाला भवन दशकों पुराना और पूरी तरह खंडहर हो चुका है।
- दीवारों में चौड़ी दरारें पड़ गई हैं।
- बारिश में छत से पानी लगातार टपकता है।
- भवन की लकड़ियां और छत के सरिये सड़कर लटक रहे हैं।
यह भवन इतना जर्जर है कि कभी भी एक बड़े हादसे का कारण बन सकता है। इसी डर से बच्चों को अब मुख्य स्कूल भवन में नहीं पढ़ाया जा रहा है।
मजबूरी का नाम ‘रंगमंच’: सड़क पार करने का खतरा अलग
स्कूल भवन की खतरनाक स्थिति को देखते हुए, बच्चों को मजबूरन गांव में बने खुले रंगमंच पर पढ़ाया जा रहा है। हर सुबह प्रार्थना के बाद, ये नन्हे बच्चे करीब 200 मीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क पार करते हुए रंगमंच तक पहुंचते हैं। चूंकि स्कूल मुख्य मार्ग पर स्थित है, इसलिए बच्चों के सड़क पार करते समय तेज रफ्तार वाहनों से दुर्घटना का खतरा भी बना रहता है। खुले में पढ़ाई होने से बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गंभीर असर पड़ रहा है।
सिस्टम का सुस्त रवैया: ‘भेजा गया है प्रस्ताव’ का मिला जवाब
जब इस मामले पर विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) के.आर. साहू से बात की गई, तो उन्होंने स्वीकार किया कि स्कूल भवन जर्जर हो चुका है। उन्होंने बताया, “वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर गांव के रंगमंच पर कक्षाएं लगाई जा रही हैं। एक अतिरिक्त कक्ष के निर्माण की स्वीकृति मिल चुकी है और सरपंच को ही इसकी निर्माण एजेंसी बनाया गया है।”
हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि 2 और अतिरिक्त कमरों के निर्माण का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, जिसकी स्वीकृति अभी तक नहीं मिली है। यह सरकारी जवाब इस सवाल को अनुत्तरित छोड़ देता है कि आखिर इन बच्चों को एक सुरक्षित छत कब मिलेगी?








