तीजा पर्व पर गुजरा (आरंग) में निराश्रित माताओं-बुजुर्गों को दिया सम्मान, संजय ‘कबीर’ शर्मा, और श्वेता शर्मा ने सेवा और संस्कार का दिया संदेश
@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, आरंग। “मां के रहते हुए उन्हें तीजा की साड़ी नहीं दे पाया… हमेशा कहती थी कि अपने लिए ले लेना, पत्नी के लिए ले लेना… बाद में दे देना। लेकिन वो बाद कभी आया ही नहीं…” — इसी गहरे भाव को संजोए गांव गुजरा (आरंग) के एक पुत्र संजय ‘कबीर’ शर्मा एवं श्वेता शर्मा ने मां के निधन के बाद से 2008 से लगातार तीजा पर्व को मां की स्मृति में समाजसेवा और सम्मान के पर्व के रूप में मनाने की परंपरा बना ली है।
इस वर्ष भी तीजा पर्व पर गांव के लगभग 147 निराश्रित पेंशनधारियों के बीच पहुंचकर उन्होंने स्नेह और सम्मान का संचार किया। कई बुजुर्ग जो चल-फिर नहीं सकते, उनके पास बैठकर उन्होंने कहा कि “महतारी वंदन योजना सचमुच सरकार की एक सही पहल है, जिसने महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत किया है। इन माता-पिता के बीच बैठने से उनके स्नेह का अनुभव होता है और अपनी जमीनी औकात का भी एहसास होता है।”

तीजा पर सेवा का संकल्प
गांव की सभी महिला पंचों और सरपंच महोदया को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि तीजा पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि माताओं और बहनों की सेवा का व्रत है। उन्होंने वादा किया कि बहुत जल्द इन बुजुर्गों को छत्तीसगढ़ के तीर्थस्थलों की यात्रा पर ले जाया जाएगा।
उन्होंने गांववासियों को नशा मुक्ति की शपथ भी दिलाई और कहा कि “आज छोटे-छोटे बच्चे भी नशे की चपेट में आ रहे हैं। इसे रोकना समाज की जिम्मेदारी है। मैं भी इस जनजागृति में समय-समय पर साथ दूंगा।”
मां की अमर स्मृति
उन्होंने भावुक होकर कहा— “देने के लिए धन-दौलत से ज्यादा एक हृदय की आवश्यकता होती है। मां अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर जब भी गांव आता हूं और इन माताओं-बहनों से मिलता हूं, तो लगता है मां अभी भी मेरे साथ हैं। शायद ऊपर से भी यही सोचती होंगी कि उसका बेटा उसे भूला नहीं है।”
जीवन का संदेश
गांव की माताएं और बहनें उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहती हैं कि “तुम कुछ मत दिया करो… बस आते-जाते रहा करो, तुम्हारे आने से अच्छा लगता है।”
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने तुलसीदास की पंक्तियां सुनाकर सबको दया और सेवा का संदेश दिया—
“दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान…
तुलसी दया न छोड़िए, जब तक घट में प्राण।”








