संवाददाता तुकाराम कंसारी
@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, नयापारा राजिम। नगर के श्री नीलकंठ मारुति मंदिर बड़ई पारा में शिव पुराण कथा के द्वितीय दिवस में प्रवचन करते हुए पंडित जयश्रवण महाराज ने कहा कि विदेश्वर संहिता में वर्णन आया है कि धर्म क्षेत्र प्रयाग में मुनियों ने एक ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया, वहां पौराणिक शिरोमणि व्यास शिष्य सूत जी मुनियों का दर्शन करने के लिए आए ,मुनियों ने हाथ जोड़कर सूत जी से निवेदन किया हे सूत जी यदि आपकी कृपा हो तो घोर कलयुग आने पर मनुष्य पूणय कम
र्म से दूर रहेंगे,अ सत्य भाषी होंगे, दुराचार में फंस जाएंगे दूसरों की निंदा में तत्पर होंगे पर धन एवं पर स्त्री में आसक्त होंगे, हिंसा करेंगे माता-पिता से दवेष रखेंगे, ब्राहमण वेद बेच कर जीविका चलाएंगे ।विद्या का उपयोग धन उपार्जन में करेंगे अपनी जाति के कर्म को छोड़कर दूसरों को ठगेंगे ब्रह्म ज्ञान से शुन्य होंगे छतरी भी स्वधर्म का त्याग कर को संगी पापी व्यभिचार होंगे सॉरी का उनमें अभाव होगा वैसे संस्कार भ्रष्ट कुमार की धनोपाजर्न पारायण नापतोल में कुछ चित्र वृत्ति वाला होगा शुद्ध ब्राह्मण के अचार में तत्पर होंगे वह अपना धर्म कर्म छोड़कर उज्जवल वेशभूषा वाले होकर कुटिल और डीज निंदक होंगे दीजिए यदि धनी हुए तो कुकर में लग जाएंगे स्त्रियां सदाचार से भ्रष्ट पति का अपमान करने वाली सास ससुर से द्रव करने वाली बड़ा स्वभाव वाली पति सेवा से विमुख रहेगी इस तरह जिन्होंने अपने धर्म का त्याग कर दिया है ऐसे लोगों को उत्तम गति की प्राप्ति कैसे होगी कृपा पूर्वक बताइए उन मुनियों की यह बात सुनकर सूत जी मन ही मन भगवान शंकर का धयान करके स्मरण करके बोले है महात्मा तीनों लोकों का हितकारी सबसे उत्तम यह शिव पुराण जिसमें श्लोक संख्या 1 लाख है, परंतु व्यास जी ने उसे 24000 श्लोकों में संक्षिप्त कर दिया है ,इसमें सात संहिताएं विदेश्वर संहिता, रुद्र संहिता, शत-रूद्र संहिता, कोटी रूद्र संहिता, उमा संहिता, कैलाश संहिता और वायवीय संहिता यह भगवानशिव के ही द्वारा प्रतिपादित है, उनमें से सार भूत को मैं संक्षेप करके बता रहा हूं इस,कान से भगवान के नाम गुण ,वाणी द्वारा कीर्तन, एवं मन से मनन ,इन तीनों को महान साधन कहा गया है जो इन तीनों साधनों के अनुष्ठान में समर्थ ना हो वह भगवान शंकर के लिंग एवं मूर्ति की स्थापना करके नित्य पूजा करके संसार सागर से पार हो सकता है, लिंग के प्राकट्य का रहस्य प्रसंग नंदिकेश्वर ने भगवान महादेव के लिंग के आविर्भाव प्रसंग सुनाया, फिर महाराज जी ने शिवरात्रि, तिथि, पूजा विधि सकल एवं निष्कल रूप आदि का वर्णन किया। रविवार होने के कारण श्रोताओं से प्रवचन कक्ष भरा हुआ था।








