@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, बलौदाबाजार। एक ओर जहां भारत चंद्रयान-3 और डिजिटल क्रांति का जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से महज 35 किलोमीटर दूर एक गांव आज भी आदिम युग में जीने को मजबूर है। पलारी ब्लॉक का छेरकाडीह गांव विकास की हकीकत और सरकारी दावों के बीच की खाई का जीता-जागता सबूत है, जहाँ 250 से ज्यादा जिंदगियां हर साल तीन महीने के लिए एक बांस के अस्थायी पुल पर टिक जाती हैं।
दो हिस्सों में बंटा गांव, जानलेवा बना नाला
छेरकाडीह गांव के बीचों-बीच एक बरसाती नाला बहता है, जो मानसून के आते ही रौद्र रूप ले लेता है। हर साल दो से तीन महीने तक इस नाले में 8 से 10 फीट तक पानी का तेज बहाव रहता है। यह नाला गांव को दो हिस्सों में बांट देता है। नाले के उस पार दो वार्ड हैं, जिनमें करीब 50 घरों के 250 से ज्यादा लोग रहते हैं। इन तीन महीनों के लिए उनका संपर्क बाकी दुनिया से लगभग कट जाता है।
सबसे दर्दनाक कहानी: खाट पर जिंदगी, मवेशी बह गए
यहां की सबसे भयावह तस्वीर तब दिखती है, जब कोई बीमार पड़ जाता है या कोई महिला गर्भवती होती है। गांव वाले बताते हैं कि एंबुलेंस या कोई भी वाहन तो दूर, पैदल भी नाला पार करना नामुमकिन होता है। ऐसे में मरीजों, खासकर प्रसूता महिलाओं को खाट (चारपाई) पर लादकर, अपनी जान जोखिम में डालकर नाला पार कराना पड़ता है। कई परिवार तो गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी से दो महीने पहले ही किसी रिश्तेदार के यहां भेजने को मजबूर हो जाते हैं। इतना ही नहीं, चरवाहों की कई दुधारू मवेशियां भी इस नाले के तेज बहाव में बह चुकी हैं।
अंधेरे में बच्चों का भविष्य
इस आपदा का सबसे बुरा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। नाले में पानी भरने के बाद उस पार के बच्चे स्कूल और आंगनवाड़ी नहीं जा पाते। खतरे को देखते हुए शिक्षक भी बच्चों को स्कूल आने से मना कर देते हैं, क्योंकि प्रशासन का भी यही आदेश है। नतीजा, हर साल बच्चों की तीन महीने की पढ़ाई पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।
सांसद से कलेक्टर तक लगाई गुहार, लेकिन सब मौन
गांव के सरपंच और पंच थक चुके हैं। उनका कहना है कि वे इस स्थायी पुल की मांग को लेकर स्थानीय विधायक, सांसद, मंत्री और कलेक्टर तक के दरवाजे खटखटा चुके हैं, लेकिन हर जगह से सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं। हर साल ग्रामीण चंदा इकट्ठा कर बांस-बल्ली का एक अस्थायी पुल बनाते हैं, लेकिन वह भी केवल पैदल चलने वालों के लिए है और हमेशा खतरे से भरा रहता है।
यह गांव सरकार की उन तमाम योजनाओं पर एक बड़ा सवालिया निशान है, जो गांव-गांव तक सड़क और विकास पहुंचाने का दावा करती हैं। छेरकाडीह के लोग बस एक ही सवाल पूछ रहे हैं- आखिर उनके हिस्से का विकास कब आएगा?








