विशेष समाचार…
@सतीश शर्मा, प्रधान संपादक
“छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली अब कठघरे में”
@छत्तीसगढ़ लोकदर्शन, मनेंद्रगढ़/चिरमिरी/भरतपुर।
सूचना का अधिकार (आरटीआई) पारदर्शिता और जवाबदेही का सबसे सशक्त औजार माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली अब कठघरे में है। आरोप है कि आयोग न केवल विभागों को बचाने में जुटा है बल्कि अब आदेशों से मुकरते हुए बिना हस्ताक्षर वाले पत्र तक जारी कर रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता ने खोला राज
मामला मनेंद्रगढ़ के आरटीआई कार्यकर्ता अशोक श्रीवास्तव से जुड़ा है। उन्होंने वन विभाग से वर्ष 2017 से 2022 तक की कैशबुक की जानकारी मांगी थी।पहले जन सूचना अधिकारी ने जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया।
प्रथम अपील में भी राहत नहीं मिली।
मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचा तो तत्कालीन आयुक्त धनवेंद्र जायसवाल ने स्पष्ट आदेश दिया कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
लेकिन आदेश के बावजूद जानकारी अधूरी दी गई और हैरानी की बात यह रही कि आयोग की ओर से भेजे गए पत्र पर आयुक्त के हस्ताक्षर ही नहीं थे।
भ्रष्ट तंत्र की ओर इशारा…
इस पूरे घटनाक्रम पर आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक श्रीवास्तव ने तीखा प्रहार करते हुए कहा—
“आयोग ने खुले तौर पर जन सूचना अधिकारी का पक्ष लिया और झूठी दलीलों पर आदेश पारित किया। यह आयोग में सक्रिय निचले स्तर के भ्रष्ट तंत्र की ओर इशारा करता है, जो सूचना न देने के लिए आदेशों तक में छेड़छाड़ कर रहा है। कई मामलों में बिना नाम और हस्ताक्षर के आदेश जारी किए जाते हैं, जिनकी कोई कानूनी मान्यता ही नहीं होती।”
राज्यपाल और मुख्यमंत्री को शिकायत
- श्रीवास्तव ने इस मामले की लिखित शिकायत राज्यपाल और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को भेजी है। उन्होंने मांग की है कि—
- पूरे प्रकरण की स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
- दोषियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
- आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
- राज्यपाल के अधीन एक स्वतंत्र प्रकोष्ठ बनाया जाए, जो आरटीआई अनुपालन की निगरानी करे।
पारदर्शिता पर संकट
यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यदि समय रहते उच्च स्तर पर हस्तक्षेप नहीं हुआ तो पारदर्शिता का यह ऐतिहासिक कानून सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह जाएगा।











